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अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
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वाय़ुरु उवाच
अग्निं त्वं यजसे नित्यं कस्मादर्जुन व्राह्मणम् |  १३   क
स हि सर्वस्य लोकस्य हव्यवाट्किं न वेत्सि तम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति