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अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
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वाय़ुरु उवाच
द्रष्टव्यं नैतदेवं हि कथं ज्याय़स्तमो हि सः |  १७   क
स्मृतमाकाशमण्डं तु तस्माज्जातः पितामहः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति