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अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
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वाय़ुरु उवाच
त्यक्त्वा महीत्वं भूमिस्तु स्पर्धय़ाङ्गनृपस्य ह |  २   क
नाशं जगाम तां विप्रो व्यष्टम्भय़त कश्यपः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति