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अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
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वाय़ुरु उवाच
अक्षय़ा व्राह्मणा राजन्दिवि चेह च नित्यदा |  ३   क
अपिवत्तेजसा ह्यापः स्वय़मेवाङ्गिराः पुरा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति