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अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
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वाय़ुरु उवाच
स ताः पिवन्क्षीरमिव नातृप्यत महातपाः |  ४   क
अपूरय़न्महौघेन महीं सर्वां च पार्थिव ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति