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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
सत्त्वस्थः सात्त्विकान्भावाञ्शुद्धान्पश्यति संश्रितः |  ३३   क
स देही विमलः श्रीमाञ्शुद्धो विद्यासमन्वितः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति