सभा पर्व  अध्याय ४५

धृतराष्ट्र उवाच

न वार्यो व्यवसाय़ो मे विदुरैतद्व्रवीमि ते |  ५७   क
दैवमेव परं मन्ये येनैतदुपपद्यते ||  ५७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति