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वन पर्व
अध्याय १३८
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लोमश उवाच
किं नु मे नाग्नय़ः शूद्र प्रतिनन्दन्ति दर्शनम् |  ४   क
त्वं चापि न यथापूर्वं कच्चित्क्षेममिहाश्रमे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति