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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़ं तु मे स्यात्सुमहत्कृतं चक्रगदाधर |  ११   क
श्रीमन्प्रीतेन मनसा सर्वं यावदनन्दन ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति