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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
मङ्गल्यान्पक्षिणश्चैव यच्चान्यदपि पूजितम् |  २१   क
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च कौन्तेय़ो वाह्यां कक्ष्यामगात्ततः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति