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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भय़ावहे |  १   क
तमसा संवृते लोके रजसा च महीपते |  १   ख
नापश्यन्त रणे योधाः परस्परमवस्थिताः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति