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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पुरस्ताज्जघने तु शल्य; स्तथा द्रौणिः पार्श्वतः सौवलश्च |  ११   क
स्वय़ं तु सर्वाणि वलानि राज; न्राजाभ्ययाद्गोपय़न्वै निशाय़ाम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति