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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
प्रकम्पितानामभिघातवेगै; रभिघ्नतां चापततां जवेन |  २२   क
वक्त्राण्यशोभन्त तदा नराणां; वाय़्वीरितानीव महाम्वुजानि ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति