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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
महावने दाव इव प्रदीप्ते; यथा प्रभा भास्करस्यापि नश्येत् |  २३   क
तथा तवासीद्ध्वजिनी प्रदीप्ता; महाभय़े भारत भीमरूपा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति