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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
रथाश्वनागाकुलदीपदीप्तं; संरव्धय़ोधाहतविद्रुताश्वम् |  ३२   क
महद्वलं व्यूढरथाश्वनागं; सुरासुरव्यूहसमं वभूव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति