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शान्ति पर्व
अध्याय २०
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वैशम्पाय़न उवाच
हरिश्चन्द्रः पार्थिवेन्द्रः श्रुतस्ते; यज्ञैरिष्ट्वा पुण्यकृद्वीतशोकः |  १४   क
ऋद्ध्या शक्रं योऽजय़न्मानुषः सं; स्तस्माद्यज्ञे सर्वमेवोपय़ोज्यम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति