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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेय़ातां महोदधौ |  १५   क
समेत्य च व्यपेय़ातां तद्वद्भूतसमागमः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति