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शान्ति पर्व
अध्याय २९१
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वसिष्ठ उवाच
वृतं नैकात्मकं येन कृत्स्नं त्रैलोक्यमात्मना |  १९   क
तथैव वहुरूपत्वाद्विश्वरूप इति स्मृतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति