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शान्ति पर्व
अध्याय १३९
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श्वपच उवाच
नैतत्खादन्प्राप्स्यसे प्राणमन्यं; नाय़ुर्दीर्घं नामृतस्येव तृप्तिम् |  ६४   क
भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोऽस्तु; श्वभक्षणे श्वा ह्यभक्षो द्विजानाम् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति