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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
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भीष्म उवाच
सर्गस्यादौ स्मृतो व्रह्मा प्रजासर्गकरः प्रभुः |  १०५   क
जानाति देवप्रवरं भूय़श्चातोऽधिकं नृप |  १०५   ख
परमात्मानमीशानमात्मनः प्रभवं तथा ||  १०५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति