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शान्ति पर्व
अध्याय १३९
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श्वपच उवाच
आत्मैव साक्षी किल लोककृत्ये; त्वमेव जानासि यदत्र दुष्टम् |  ८३   क
यो ह्याद्रिय़ेद्भक्ष्यमिति श्वमांसं; मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीय़म् ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति