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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
यथा प्रदीपे ज्वलतोऽनलस्य; सन्तापजं रूपमुपैति किञ्चित् |  १७   क
न चान्तरं रूपगुणं विभर्ति; तथैव तद्दृश्यते रूपमस्य ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति