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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
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कुन्त्यु उवाच
सन्ति देवनिकाय़ाश्च सङ्कल्पाज्जनय़न्ति ये |  २१   क
वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात्सङ्घर्षेणेति पञ्चधा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति