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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं विचिन्त्य वहुधा भय़शोकसमन्वितः |  १४   क
वासुदेवमिदं वाक्यं धर्मराजोऽभ्यभाषत ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति