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शान्ति पर्व
अध्याय १५
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वैशम्पाय़न उवाच
न हि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिदहिंसय़ा |  २०   क
सत्त्वैः सत्त्वानि जीवन्ति दुर्वलैर्वलवत्तराः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति