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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन ह |  ६६   क
शिर उत्कृत्य तरसा पातय़ामास पाण्डवः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति