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आदि पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ छत्राणि शुभ्राणि पाण्डुराणि वृहन्ति च |  १२   क
आजह्रुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति