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शान्ति पर्व
अध्याय २७०
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वृत्र उवाच
ऐश्वर्यं वै महद्व्रह्मन्कस्मिन्वर्णे प्रतिष्ठितम् |  ३१   क
निवर्तते चापि पुनः कथमैश्वर्यमुत्तमम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति