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शान्ति पर्व
अध्याय २०३
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गुरुरु उवाच
रसज्ञाने तु जिह्वेय़ं व्याहृते वाक्तथैव च |  ३०   क
इन्द्रिय़ैर्विविधैर्युक्तं सर्वं व्यस्तं मनस्तथा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति