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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
सचेतनं जीवगुणं वदन्ति; स चेष्टते चेष्टय़ते च सर्वम् |  २५   क
ततः परं क्षेत्रविदं वदन्ति; प्रावर्तय़द्यो भुवनानि सप्त ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति