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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
अथ यद्दुःखसंय़ुक्तमतुष्टिकरमात्मनः |  ३१   क
प्रवृत्तं रज इत्येव तन्नसंरभ्य चिन्तय़ेत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति