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शान्ति पर्व
अध्याय २२४
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भीष्म उवाच
काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव; त्रिंशत्तु काष्ठा गणय़ेत्कलां ताम् |  १२   क
त्रिंशत्कलाश्चापि भवेन्मुहूर्तो; भागः कलाय़ा दशमश्च यः स्यात् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति