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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
कच्चिन्न शूद्रेण न हीनजेन; वैश्येन वा करदेनोपपन्ना |  १५   क
कच्चित्पदं मूर्ध्नि न मे निदिग्धं; कच्चिन्माला पतिता न श्मशाने ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति