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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
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नारद उवाच
रुजन्ति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः |  ३   क
साय़का इव तीक्ष्णाग्राः प्रय़ुक्ता दृढधन्विभिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति