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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
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सिद्ध उवाच
शरीरं च जहात्येव निरुच्छ्वासश्च दृश्यते |  २२   क
निरूष्मा स निरुच्छ्वासो निःश्रीको गतचेतनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति