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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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याज्ञवल्क्य उवाच
एवमुक्त्वा सम्प्रय़ातो दिवं स; विभ्राजन्वै श्रीमता दर्शनेन |  ८१   क
तुष्टश्च तुष्ट्या परय़ाभिनन्द्य; प्रदक्षिणं मम कृत्वा महात्मा ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति