आश्वमेधिक पर्व  अध्याय २९

समुद्र उवाच

राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि |  १९   क
क्षत्रवन्धूनिमान्प्राणैर्विप्रय़ोज्य पुनः पुनः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति