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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
अप्राप्तामेव तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव |  १०३   क
त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति