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स्त्री पर्व
अध्याय १४
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भीमसेन उवाच
अन्यस्यापि न पातव्यं रुधिरं किं पुनः स्वकम् |  १४   क
यथैवात्मा तथा भ्राता विशेषो नास्ति कश्चन ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति