शान्ति पर्व  अध्याय १४

वैशम्पाय़न उवाच

रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च |  २०   क
तत्त्वय़ा निहतं वीर तस्माद्भुङ्क्ष्व वसुन्धराम् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति