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वन पर्व
अध्याय १३३
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राजो उवाच
आशंससे वन्दिनं त्वं विजेतु; मविज्ञात्वा वाक्यवलं परस्य |  १९   क
विज्ञातवीर्यैः शक्यमेवं प्रवक्तुं; दृष्टश्चासौ व्राह्मणैर्वादशीलैः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति