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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय़ |  ३५   क
इष्ट्वा यथावद्वलभिदरुणाय़ामुपास्पृशत् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति