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शान्ति पर्व
अध्याय १४
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वैशम्पाय़न उवाच
यदि हि स्युरनुन्मत्ता भ्रातरस्ते जनाधिप |  ३३   क
वद्ध्वा त्वां नास्तिकैः सार्धं प्रशासेय़ुर्वसुन्धराम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति