शान्ति पर्व  अध्याय १४

वैशम्पाय़न उवाच

आमन्त्र्य विपुलश्रोणी साम्ना परमवल्गुना |  ५   क
भर्तारमभिसम्प्रेक्ष्य ततो वचनमव्रवीत् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति