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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखादाकुलितेन्द्रिय़ः |  १०५   क
न प्रसीदति मे रुद्रः किमेतदिति चिन्तय़न् |  १०५   ख
अथापश्यं क्षणेनैव तमेवैरावतं पुनः ||  १०५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति