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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
दीनान्धकृपणान्दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि |  ११   क
याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विताः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति