अनुशासन पर्व  अध्याय १४

उपमन्युरु उवाच

रक्ताक्षं सुमहानासं सुकर्णं सुकटीतटम् |  १०८   क
सुपार्श्वं विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् ||  १०८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति