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वन पर्व
अध्याय १८४
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सरस्वत्यु उवाच
नाश्रोत्रिय़ं देवहव्ये निय़ुञ्ज्या; न्मोघं परा सिञ्चति तादृशो हि |  १४   क
अपूर्णमश्रोत्रिय़माह तार्क्ष्य; न वै तादृग्जुहुय़ादग्निहोत्रम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति