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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
शरश्च सूर्यसङ्काशः कालानलसमद्युतिः |  १२४   क
यत्तदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत् ||  १२४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति