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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन्व्रह्मविष्णुसुरेष्वपि |  १३०   क
तदहं दृष्टवांस्तात आश्चर्याद्भुतमुत्तमम् ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति